जब सुबह हो,
किरण तू फूट के निकले...
वर्ण सारे बेशरम हों,
भेद सारे बेवहम हों,
शक्त हों, कि पंगु हों वे
किन्तु सारे निज-करम हों;
लालिमा से नीलिमा तक छूट कर बिखरे...
जब सुबह हो,
किरण तू फूट कर निकले...
हर जगह पहुंचेगी तू,
रात-दिन महकेगी तू,
दुःख हरेगी, सुख करेगी,
चम चमक चमकेगी तू;
इस क्षितिज से उस क्षितिज तक कूट के मचले...
जब सुबह हो,
किरण तू फूट कर निकले...
जगती तेरे मार्ग पर है,
लोक-नीति सार पर है,
तू जिधर चल दे वृहद् हो
सब उसी महाद्वार पर हैं;
तेरे बिन 'कोई नहीं' जो तम प्रभा कर दे...
जब सुबह हो,
किरण तू फूट कर निकले...
याद रख- "महाजनाः येन गतो स पन्थः
[कल जो सूरज को पुकारा था, आज उसने रश्मि वरदान में दी है....]



