Thursday, March 15, 2012

खग-कर


जब सुबह हो,
किरण तू फूट के निकले...

वर्ण सारे बेशरम हों,
भेद सारे बेवहम हों,
शक्त हों, कि पंगु हों वे
किन्तु सारे निज-करम हों;
लालिमा से नीलिमा तक छूट कर बिखरे...
जब सुबह हो,
किरण तू फूट कर निकले...

हर जगह पहुंचेगी तू,
रात-दिन महकेगी तू,
दुःख हरेगी, सुख करेगी,
चम चमक चमकेगी तू;
इस क्षितिज से उस क्षितिज तक कूट के मचले...

जब सुबह हो,
किरण तू फूट कर निकले...

जगती तेरे मार्ग पर है,
लोक-नीति सार पर है,
तू जिधर चल दे वृहद् हो
सब उसी महाद्वार पर हैं;
तेरे बिन 'कोई नहीं' जो तम प्रभा कर दे...

जब सुबह हो,
किरण तू फूट कर निकले...

याद रख- "महाजनाः येन गतो स पन्थः

[कल जो सूरज को पुकारा था, आज उसने रश्मि वरदान में दी है....]

Sunday, February 19, 2012

आजा तेरे रूप पे गीत लिखूं...


आजा तेरे रूप पे गीत लिखूं...

गहरी अंधियारी में कोई दो दीप जलें, तेरी आँखें हैं..
जन्नत के फरिस्तों की आपस की गुफ्तगू, तेरी बातें हैं..
सूरज की किरण तेरे गेंसुओं में गर उलझे कभी
उसको सोने का मीत लिखूं...
आजा तेरे रूप पे गीत लिखूं...

कोई सुन्दर साज़ बजे मंदिर में कभी, हँसी तेरी छाई..
रुनझुन जो कहीं पायल बाजे, मुझको लागे की तू आई..
तू जो चाहे, तू जो मांगे मेरे दाता से
उसको दुनिया की रीत लिखूं...
आजा तेरे रूप पे गीत लिखूं...

तू मुस्काए तो यूँ लागे, कलियाँ खिलने ही वाली हैं..
तारे चमके, नदिया छलके, सब्जों से भरी कोई डाली है..
तू अनजाना होकर भी मुझपे डाले नजर
उसको मैं सुन्दर प्रीत लिखूं...
आजा तेरे रूप पे गीत लिखूं...

चन्दा की सूरत है तुझसी, गन्गा की सीरत है तुझसी..
ये ताजमहल भी तुझसा है, अल्लाह की मूरत है तुझसी..
जगवालों में जब कोई नहीं समझे मेरी
उनके मन की मैं भीत लिखूं...
आजा तेरे रूप पे गीत लिखूं... 

 

Thursday, January 5, 2012

जितना तुझे जाना है.....

[इसको पढ़कर ये मत समझना कोई कि मैं परेशान हूँ, बस इसे थोड़ा सा जो समझा है वही बयान करने कि कोशिश भर है ...]

जिन्हें साथ रहने की तलब सी रही
वो बिछड़ से गए |
जिनको मनाने को मन करता रहा
वो बिगड़ से गए |
.                                             ज़िन्दगी! रंग तेरे, रोज़ नए ||१||

कभी खुशियाँ रहीं, मेरे चारों तरफ,
सब हँसते रहें |
रंगों की तरह किसी पानी में
फिर घुलते रहें |
.                                             लोग तेरे, लोग मेरे! रोज़ नए ||२||

कोई साथी मुझे बड़ा प्यारा लगा
वही रूठा रहा |
जन्नत में भी मेरा खुदा मुझसे
ज़रा छूटा रहा |
.                                             शाम कई, कई डेरे; रोज़ नए ||३||

उम्मीद का मुझसे कोई धागा रहा
बंधा सा यहीं |
उन्हें लगता रहा, कोई चीज़ हूँ मै;
मैं तो कोई नहीं |
.                                             झूठे बड़े पहचान मेरे, रोज़ नए ||४||

Sunday, December 11, 2011

विचरति तव नगरे .....

ढूंढता है दिवाना हर गली,
पराए शहर में अपना मेरा |
सर छुपाने को एक छाँव सा कुछ
शब् बिताने को किसी का डेरा ||१||

मुझको आदत भटकने की तो नहीं
धूप चढ़ने से पहले पहुचुँगा |
ये कसम है कि लौट जाऊँगा
देखूंगा पहले मैं मुखड़ा तेरा ||२||

फज्र से पहले तेरी गलियों तक
मैं कदम ले के आ गया तो हूँ |
ज़ुह्र तक भीड़ नाप लूँगा मैं,
पा ही जाऊँगा मैं वो घर तेरा ||३||

इस शहर में भी कई दिवाने हैं
सू-ए-मस्जिद बता ही डालेंगे |
बुत-शिकन चाहे तोड़ डालेंगे
रात से पहले वो सनम मेरा ||४||

इश्रफिल बाग़ दे उससे पहले,
जश्न जन्नत का हो, उससे पहले;
लौट आउंगा मुंह छुपा के मैं-
'कोई नहीं' देखेगा फितना-फेरा ||५||

[ये ग़ज़ल वैसे तो पिछले हफ्ते ही बन गयी थी, आज इसे लिख पाया हूँ | उतनी अच्छी नहीं है, क्योकि मुझे कतई पसंद नहीं है | अगर किसी को कुछ समझ में आए, तो रहम खा के अपनी समझ को भूल जाइए; ये सब एक बकवास है | कुछ लफ़्ज़ों के हिंदी मायने दे रहा हूँ ; (मैं भी बड़ा बदमाश हूँ ना ) :P  -

शब्- रात, फज्र- सुबह, ज़ुह्र- दोपहर, सू- रास्ता, बुतशिकन - मूर्ति तोड़ने वाले, सनम- देवता की मूर्ति, इश्रफिल- गन्धर्व/फ़रिश्ता जो प्रलय का ऐलान करता है; बाग़- पुकार/ऐलान, फितना.फेरा - प्रलय के समय का तूफ़ान ]

हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे ..........

Friday, November 4, 2011

ख़ाब ..... خاب

ये मेरा बुरा साल गुज़र जाए तो अच्छा |
मझधार में डूबा है जो, तर जाए तो अच्छा ||१||

कितने दरार सहता है, दीवार है - पत्थर |
ये आज टूट के जो बिखर जाए तो अच्छा ||२||

दीवानगी ने आपकी दीवाना कर दिया |
दीवानेपन से दिल मेरा भर जाए तो अच्छा ||३||

माने न माने होने को, तेरे कि या मेरे |
हर शख्स की पहचान मुकर जाए तो अच्छा ||४||

रूठा हुआ है एक मेरा यार जो मुझसे |
दुनिया भी सारी मुझसे बिगड़ जाए तो अच्छा ||५||

हूँ हिज्र में कि या कि किसी जंग में हूँ मैं ?
मजहब भी मेरा, खुदा से डर जाए तो अच्छा ||६||

कातिल के दर से सलामत होने में हैं लानत |
काँधे से मेरे आज ये सर जाए तो अच्छा ||७||

जीना नहीं होता मेरा तेरे बिना ज़ालिम |
इस दर्द से 'कोई नहीं' मर जाए तो अच्छा ||८||

Friday, September 16, 2011

ज़रा सोचिये....


फूल से खुशबू चली, बैठी हवा के पंख पे,
आ गया भँवरा इधर, 
किसने बुलाया है इसे?

ये समंदर बादलों को अपना रस है दे रहा,
आ गयी नदिया भरी,
किसने बुलाया है इसे?

रौशनी के नाम पे शम्मा पिघलती है यहाँ,
आ गया परवाना एक,
किसने बुलाया है इसे?

काम के बोझे से जब थक के ज़रा चुप हो गया,
आ गयी निंदिया यहाँ,
किसने बुलाया है इसे?

हुस्न के आँगन में इश्क वाला गर 'कोई नहीं',
आ गया दीवाना मैं,
"किसने बुलाया है इसे?"


Thursday, September 15, 2011

क्या करूँ फिर ?

जो तू बेवफा होता तो हम कुछ बददुआ देते,
तू सिर है वफ़ा का,
कुछ कहते नहीं बनता|(१)

जो ये इश्क ना होता तो हम यूँ ही जी लेते,
ये है हर तरफ मेरे,
कहीं जाते नहीं बनता|(२)

मेरी साँसे, मेरी धड़कन, मेरा दिल मेरा नहीं है,
कशी कब की हुई होती,
पर ये मरना नहीं बनता|(३)

भरी बरसात है, दरिया है, समंदर भी यहीं है,
तरास कोई नहीं है,
मेरा पीना नहीं बनता|(४)