Wednesday, August 3, 2011

अरमान

दर-ओ-दीवार तमन्ना की चारों फलकों पे-
घिरा हूँ और निकलने का सबब 'कोई नहीं'||१||

हिसाब हिज्र का, ईमान का, खुदाई का-
आज मस्जिद में भी है मेरा सनम 'कोई नहीं'||२||

अहल-ए-दौराँ सब लोग गुज़रते रहते-
वक़्त चलता है मगर रुकता यहाँ 'कोई नहीं'||३||

कुछ हवस है मेरी और कुछ हवस का मैं-
चाहतें खूब हैं मगर चाहत 'कोई नहीं'||४||

एक दरगाह- एक मजार- एक कबर हूँ ज्यों-
जलाता किसी शब् यहाँ पे दिया 'कोई नहीं'||५||

सरकती रहती है हाथों से रेत की तरह-
ज़िन्दगी की कहानी इसके सिवा 'कोई नहीं'||६||




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