[अँधेरी रात में, जब ज़माना नींद की आगोश में था; हुस्न चुपके से इश्क के आँगन में आया| उसके इरादे क्या थे, ये तो आप समझ ही गए होंगे| मगर हुस्न के नखरे देखिये; ज़बह को खंज़र घोंपा तो, मगर वापस निकाला नहीं| बिचारा आज तक छटपटा रहा है- "मरना है तो एक बार में ही मर जाऊं"|]
सहन-ए-तन्हाई में दिल था टूट कर बिखरा हुआ,
और उनने कह दिया- 'ये क्या पड़ा है ज़मीन पर?'
रौंद के वो चले गए ज्यों बच रहे हों ज़र्द से,
और ये दीवाना बिछता सा रहा कालीन पर||१||
वाँ की फुर्सत, याँ की हसरत कुछ निकलती सी रही;
चीदाँ-चीदाँ झगड़ा था, कुछ मेख पर, कुछ मीन पर||२||
आए थे नज़रें चुरा के वो जहाँ के औल से-
लानते करते रहें वो मजहबों पर, दीन पर||३||
क़त्ल का मौका था पूरा, उनकी आदत भी यही,
फिर भी रक्खा रह गया ये सर उसी संगीन पर||४||
आप आए, इतना काफी है, गिला 'कोई नहीं';
बढ़ गयी शोहरत हमारी एक इसी तौहीन पर||५||
सहन-ए-तन्हाई में दिल था टूट कर बिखरा हुआ,
और उनने कह दिया- 'ये क्या पड़ा है ज़मीन पर?'
रौंद के वो चले गए ज्यों बच रहे हों ज़र्द से,
और ये दीवाना बिछता सा रहा कालीन पर||१||
वाँ की फुर्सत, याँ की हसरत कुछ निकलती सी रही;
चीदाँ-चीदाँ झगड़ा था, कुछ मेख पर, कुछ मीन पर||२||
आए थे नज़रें चुरा के वो जहाँ के औल से-
लानते करते रहें वो मजहबों पर, दीन पर||३||
क़त्ल का मौका था पूरा, उनकी आदत भी यही,
फिर भी रक्खा रह गया ये सर उसी संगीन पर||४||
आप आए, इतना काफी है, गिला 'कोई नहीं';
बढ़ गयी शोहरत हमारी एक इसी तौहीन पर||५||
आज पहली बार आपके ब्लॉग पर आया हु!
ReplyDeleteआए थे नज़रें चुरा के वो जहाँ के औल से-
लानते करते रहें वो मजहबों पर, दीन पर||३||
क़त्ल का मौका था पूरा, उनकी आदत भी यही,
फिर भी रक्खा रह गया ये सर उसी संगीन पर||४||
सुन्दर और बेहतरीन रचना और बहुत ही अच्छा लिखा है आभार
कृपया वर्ड वेरिफिकेशन हटा लें ...टिप्पणीकर्ता को सरलता होगी ...
ReplyDeleteवर्ड वेरिफिकेशन हटाने के लिए
डैशबोर्ड > सेटिंग्स > कमेंट्स > वर्ड वेरिफिकेशन को नो NO करें ..सेव करें ..बस हो गया!!
ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है!
आप से निवेदन है इस लेख पर आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया दे!
तुम मुझे गाय दो, मैं तुम्हे भारत दूंगा
धन्यवाद
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