Thursday, September 15, 2011

क्या करूँ फिर ?

जो तू बेवफा होता तो हम कुछ बददुआ देते,
तू सिर है वफ़ा का,
कुछ कहते नहीं बनता|(१)

जो ये इश्क ना होता तो हम यूँ ही जी लेते,
ये है हर तरफ मेरे,
कहीं जाते नहीं बनता|(२)

मेरी साँसे, मेरी धड़कन, मेरा दिल मेरा नहीं है,
कशी कब की हुई होती,
पर ये मरना नहीं बनता|(३)

भरी बरसात है, दरिया है, समंदर भी यहीं है,
तरास कोई नहीं है,
मेरा पीना नहीं बनता|(४)

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