लोग पूछते हैं मुझसे कि तू कौन है, किस ओर से?
हर बार बहुत सोचता हूँ, कहता हूँ मैं 'कोई नहीं'||१||
सरे-बाज़ार कल एक शोर था, हर ओर, कि वो आ गया-
फज्र से शब् तलक भटका, नज़र आया मुझे 'कोई नहीं' ||२||
किसी को मैं दीवाना लगता हूँ, किसी को रसूल आखिरी;
दर-ए-अल्लाह मुझको देखना, हस्ती मेरी 'कोई नहीं' ||३||
बहुत से दोस्त बनाए, कुछेक दुश्मन भी इन महफ़िलों में|
जब उठ के जाने लगे वापस- हमारे संग आया 'कोई नहीं' ||४||
तेरे मस्जिद में मैं सनम ढूंढ़ लेता, पर वो ज़माना रहा नहीं |
ये क्या किया मुस्तफा वालों, अब दीखता यहाँ 'कोई नहीं' ||५||
मेरे ही जैसा हँसता-खिलखिलाता दिलबर मेरा मेरे साथ है|
फिर क्यों कयासों में रहूँ मैं, ढूंढ़ता फिरूँ 'कोई नहीं' ?|६||
हर बार बहुत सोचता हूँ, कहता हूँ मैं 'कोई नहीं'||१||
सरे-बाज़ार कल एक शोर था, हर ओर, कि वो आ गया-
फज्र से शब् तलक भटका, नज़र आया मुझे 'कोई नहीं' ||२||
किसी को मैं दीवाना लगता हूँ, किसी को रसूल आखिरी;
दर-ए-अल्लाह मुझको देखना, हस्ती मेरी 'कोई नहीं' ||३||
बहुत से दोस्त बनाए, कुछेक दुश्मन भी इन महफ़िलों में|
जब उठ के जाने लगे वापस- हमारे संग आया 'कोई नहीं' ||४||
तेरे मस्जिद में मैं सनम ढूंढ़ लेता, पर वो ज़माना रहा नहीं |
ये क्या किया मुस्तफा वालों, अब दीखता यहाँ 'कोई नहीं' ||५||
मेरे ही जैसा हँसता-खिलखिलाता दिलबर मेरा मेरे साथ है|
फिर क्यों कयासों में रहूँ मैं, ढूंढ़ता फिरूँ 'कोई नहीं' ?|६||
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